कोलकाता में दुर्गा पूजा की भव्यता इस बार अनोखी होगी

कोरोनाकाल में कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा, जाहिर है हर उत्सव की तरह कोलकाता की दुर्गा पूजा भी अछूती नहीं रहेगी, और यह बात आपको कोलकाता में कदम रखते ही महसूस होने लगती है। हर साल पूजा के 4-5 महीने पहले से ही जो स्फूर्ति का स्पंदन इस शहर में महसूस होने लगता है, वह है तो जरूर, मगर इस बार उसकी स्फूर्ति कम है। सड़कों पर चहल-पहल और पूजा की खरीदारी का बाजार हर साल के मुकाबले फीका है। हालांकि यह बात तो 6 माह पहले लॉकडाउन में एक महीना बिताने के बाद ही यहां के व्यापारियों और दुर्गा पूजा समितियों को समझ में आ गई थी। लेकिन जो शहर दुर्गा पूजा उत्सव को मनाता नहीं जीता हो…वहां आखिर इस साल इन नौ दिनों में क्या होगा? यह सवाल जितना गंभीर है इसका जवाब उतना ही सहज, सरल और सुकून देने वाला है। हर वर्ष पूजा पंडालों पर करोड़ों खर्च करने वाली पूजा समितियों के पास इस बार बजट कम है, पंडाल और मूर्ति के आकार पर बंदिशें भी हैं। इसीलिए इस बार कोलकाता की पूजा का नाता भव्यता से नहीं सामाजिक दायित्वों से है। यहां की लगभग हर पूजा समिति किसी न किसी रूप में अपने बजट का एक हिस्सा समाज के उस हिस्से पर खर्च कर रही है जिसने कोरोना, लॉकडाउन या अम्फान तूफान के चलते अपनी आजीविका का साधन गंवाया है।
कन्फेडरेशन ऑफ वेस्ट बंगाल ट्रेड एसोसिएशंस के अध्यक्ष सुशील पोद्दार कहते हैं, बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान लगभग 3000 करोड़ रुपए का कारोबार होता था। इनमें पूजा पंडाल के निर्माण से लेकर बाजार में खरीदारी शामिल हैं। लेकिन कोविड-19 के कारण सुस्त अर्थव्यवस्था और बाजार की स्थिति को देखते हुए मई-जून में इसकी संभावना बन गई थी कि यह कारोबार 20 से 25 फीसदी तक सिमट जाएगा। हालांकि अनलॉक के बाद इसमें अनुमान से थोड़ी बढ़ोतरी तो हुई है। मगर फिर भी पिछले साल के मुकाबले नुकसान तो बहुत हुआ है। पूरे पश्चिम बंगाल में करीब 37,000 दुर्गा पूजा समितियां अलग-अलग आयोजन करती हैं। अकेले कोलकाता में ही 2,500 से ज्यादा पंडाल सजते हैं। इनके आयोजन भी स्पॉन्सर्स के भरोसे होते हैं और इस बार सरकारी पाबंदियों के चलते प्रायोजक अब तक खामोश हैं। मगर पूजा समितियों का उत्साह कम नहीं है।
बॉलीगंज के समाजसेवी संघ की पूजा को इस बार 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस बार उन्होंने मई में आए अम्फान तूफान से प्रभावित सुदूरवर्ती हिंगलगंज गांव के 75 परिवारों को चुना है। पूजा समिति इन परिवारों को वोकेशनल ट्रेनिंग से लेकर आर्थिक मदद मुहैया करवाएगी। राज्य के खेल एवं पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर अरूप बिस्वास के पंडाल के तौर पर जाने जाने वाले न्यू अलीपुर के सुरुचि संघ की पूजा की थीम है ‘इस बार उत्सव नहीं मानव की पूजा।’ इसी थीम के तहत 10 हजार जरूरतमंदों और गरीबों को कपड़े बांटे गए हैं।कोलकाता की पूजा समितियों ने कोरोनाकाल में पंडाल का आकार घटाया, वही सामाजिक दायित्व निभाने में बढ़ चढ़कर आगे आए।

दुर्गा प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध कुम्हारटोली में भी इस बार नुकसान का हिसाब लगाया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर समेत कई देशों में फाइबर की प्रतिमाएं बेचने वाले कौशिक घोष बताते हैं कि इस साल फरवरी तक दो ऑर्डर मिले थे… एक कनाडा और दूसरा ऑस्ट्रेलिया से…बस। इसके बाद अब तक विदेश से कोई ऑर्डर नहीं मिला। इस बार स्थानीय पंडालों को ही मूर्तियों की सप्लाई कर गुजारा कर रहे हैं। कौशिक कहते हैं कि हर साल वह 35 प्रतिमाएं तक बनाते थे, मगर इस बार सिर्फ 15 ही बनाई हैं।

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